बौद्ध धर्म के दो भाग क्यों हुए? हीनयान और महायान में अन्तर

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बौद्ध धर्म में मतभेद के कारण

 भगवानबुद्ध के निर्वाण के मात्र 100 वर्षो बाद ही बौद्ध धर्म में मतभेद उभरकर सामने आने लगे थे| वैशाली में सम्पन द्वितीय बौद्ध संगति में थेर भिक्षुयों ने मतभेद रखने वाले भिक्षुयों को संघ से बाहर निकाल दिया| बाहर निकाले गए भिक्षुयों ने उसी समय अपना अलग संघ बनाकर स्वयं को “महासांघिक” और जिन्होंने बाहर निकाला था उन्हें “हीनसाघिक” नाम दिया| जिसने कालांतर में महायान और हीनयान का रूपधारण किया|

सम्राट अशोक ने 249 BC में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगति का आयोजन कराया जिसमे भगवान बुद्ध के वचनों को संकलित किया गया| इस बौद्ध संगति में पालि त्रिपिटक का संकलन हुआ| श्रीलंका में प्रथम शती BC में पालि त्रिपिटक को सर्वप्रथम लिपिबद्ध किया गया था| यही पालि त्रिपिटक अब सर्वाधिक प्राचीन त्रिपिटक के रूप में उपलब्ध है|

हीनयान का दर्शन – 

हीनयान का आधार मार्ग आष्टांगिक है| वे जीवन को कष्टमय मानते है| इन कष्टो से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति को स्वयं ही प्रयास करना होगा क्योंकि आपकी सहायता करने के लिए न कोई ईश्वर है, न कोई देवी और न ही कोई देवता| बुद्ध की उपासना करना भी हीनयान विरुद्ध कर्म है|

खुद मरे बगैर स्वर्ग नहीं मिलेगा इसलिए जंगल में तपस्या करो| जीवन के हर मोर्चे पर पराक्रम करो| पूजा, पाठ, ज्योतिष और प्रार्थना सब व्यर्थ है, यह सिर्फ सुख का भ्रम पैदा करते है और दिमाग को दुविधा में डालते है| शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए स्वयं को ही प्रयास करना होगा|हीनयान कई मतों में विभाजित था| माना जाता है कि इसमें कुल अठारह मत थे जिसमें से प्रमुख तीन है – थेरवाद (स्थविरवाद), सर्वास्तित्ववाद (वेभाषित) और सोतांत्रिक|

हीनयान के सिद्धांतों के अनुसार बुद्ध एक महापरुष थे| उन्होंने अपने प्रयत्नों से निर्वाण प्राप्त कर निर्वाण प्राप्ति का उपदेश दिया| हीनयान अनीश्वरवादी और कर्मप्रधान दर्शन है| भाग्यवाद जीवन का दुश्मन है|

महायान का दर्शन –

महायान ने बुद्ध को ईश्वर तुल्य माना| सभी प्राणी बुद्धत्व को प्राप्त कर सकते है| दुःख है तो बहुत ही सहज तरीके से उनसे छुटकारा पाया जा सकता है| पूजा – पाठ भले ही न करे लेकिन प्रार्थना में शक्ति है और सामूहिक रूप से की गई प्रार्थना से कष्ट दूर होते है|

आत्मा को सभी कष्टों से छुटकारा पाकर जन्म-मरण के चक्र से बाहर निकलना है तो बुद्ध द्वारा निर्वाण प्राप्ति के जो साधन बताये गए है उन्हें अनुशासनबद्ध होकर करे|

महायान भी कई मतों में विभाजित है| महायान अश्वघोष के ग्रंथों और नागार्जुन के माध्यमिक और असंग के योगाचार्य के रूप में महायान के विकसित रूप की स्थापन्ना हुई|

महायान एक विशाल यान अर्थात जलपोत के समान है जिसमे कई लोग बैठकर संसार सागर को पार कर सकते है, इसलिए वे सर्वमुक्ति की बात करते है| बुद्ध को भगवान मानते है और उनके कई अवतार के होने की घोषणा भी करते है|

महायानियों ने ही संसार भर में बुद्ध की मूर्ति और प्रार्थना के लिए स्तुपो का निर्माण किया| यूनानी, ईसाई, पारसी और अन्य धर्मानुपायी महायानियों की प्रार्थना पध्दति, स्तूप रचना, संघ व्यवस्था, रहन-सहन और पहनावे से प्रभावित थे| उन्होंने महायानियों की तरह ही उन सभी व्यवस्थायो की स्थापना की|

हीनयान एवं महायान में अन्तर – 

हीनयान –

1. हीनयान वैयक्तिक मुक्ति पर जोर देता है, अर्थात व्यष्टि हित ही सर्वोपरि है|

2. इसमें बुद्ध को महापुरुष माना है|

3. हीनयानी बुद्ध की मूर्ति नहीं, वरन प्रतीकों का प्रयोग करते है|

4. बुद्ध का पुनर्जन्म नहीं|

5. प्रचार का माध्यम पालि|

6. संप्रदाय सर्वास्तिवादीन, स्थविर्वादिन, वैभाषिक, सौत्रान्तिक, समित्या|

7. फैलाव – श्रीलंका, वर्मा, दक्षिण पूर्व एशिया|

8. प्रमुख शासक अशोक, कालाशोक|

महायान –

1. यह समग्र मुक्ति पर जोर देता है और इसके लिए समष्टि हित ही सर्वोपरि है|

2. इसमें बुद्ध को देवता माना है तथा इसकी पूजा-अर्चना की जाने लगी|

3. महायानी मूर्ति पूजा में विश्वास करते है|

4. बुद्ध का पुनर्जन्म होगा क्योंकी विश्व अभी कष्ट में है, अतः भविष्य में बुद्ध की मान्यता है| 

5. प्रचार की भाषा संस्कृत, अपवाद है मिलिंदपन्हों जो महायान का ग्रन्थ होकर भी पालि में है|

6. संप्रदाय शून्यवादी या माध्यमिक, विज्ञानवाद या योगाचार, वज्रयान, कालचक्रयन|

7. फैलाव – चीन, मध्य एशिया, कोरिया, जापान, तिब्बत, नेपाल|

8. प्रमुख शासक कनिष्क, हर्षवर्द्धन, धर्मपाल, देवपाल (कनिष्क शून्यवाद का पक्षधर, हर्षवर्द्धन विज्ञानवाद का, देवपाल और धर्मपाल वज्रयान के समर्थक)


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